कर्नाटक में जिला अस्पतालों के निजीकरण के खिलाफ जन आंदोलन

  • सौम्या, शांतम्मा, बाबू रेड्डी और शशिराज, सार्वत्रिक आरोग्य आंदोलन कर्नाटक (SAAK)

“राज्य सरकार लोगों की जान से खेल रही है। वह गरीब लोगों से सार्वजनिक अस्पतालों में उपलब्ध सेवाएं छीन रही है। सार्वजनिक अस्पतालों को बचाए रखना ज़रूरी है, इसलिए हम निजीकरण का विरोध करते हैं।”


चेन्नम्मा, रयत संघ प्रतिनिधि, कोलार में निजीकरण विरोधी संघर्ष के दौरान

पिछले कुछ वर्षों में, कर्नाटक सरकार बार-बार यह घोषणा करती रही है कि वह जिला -अस्पतालों को निजी संस्थाओं को सौंपना चाहती है। इसके पीछे मकसद है मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के नाम पर, सरकारी-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत, इन अस्पतालों को प्राइवेट हाथों में सौपना । 2022 में, पिछली राज्य सरकार ने नौ जिलों के अस्पतालों को PPP मॉडल में निजीकरण करने का प्रस्ताव दिया था। इन जिलों में लोगों द्वारा ज़ोरदार विरोध और आंदोलनों के चलते सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा। लेकिन वर्तमान राज्य सरकार अब ग्यारह जिलों के जिला अस्पतालों को PPP के तहत निजी हाथों में सौंपने की योजना बना रही है—तुमकुरु, दावणगेरे, चित्रदुर्ग, बागलकोट, कोलार, दक्षिण कन्नड़, उडुपी, बेंगलुरु ग्रामीण, विजयपुरा, विजयनगर और रामनगर। इसका व्यापक विरोध सार्वत्रिक आरोग्य आंदोलन कर्नाटक (SAAK) के नेतृत्व में चलाए जा रहे जन अभियान के तहत किया जा रहा है।

जिला अस्पतालों के निजीकरण के लिए प्रस्तावित PPP मॉडल क्या है?

PPP मॉडल में जिला अस्पतालों को निजी मेडिकल कॉलेज संचालकों को सौंपा जाता है। इसके मुख्य बिन्दु हैं:

  • निजी कंपनी सरकार की ज़मीन पर मेडिकल कॉलेज बनाती है, जो 99 साल की बेहद कम दर वाली लीज़ पर दी जाती है।
  • सरकार जिला अस्पताल को लंबे समय तक संचालन और रखरखाव के लिए निजी कंपनी को सौंप देती है।
  • सरकार की निधि से अस्पताल के विकास की अपेक्षा की जाती है।
  • तकनीकी विशेषज्ञता के आधार पर नहीं, बल्कि सबसे कम ग्रांट मांगने या सबसे ज़्यादा प्रीमियम देने वाले के साथ करार किया जाता है—इससे अक्सर राजनीतिक संबंधों वाले कॉरपोरेट्स/पूँजीपतियों को लाभ मिलता है (उदाहरण: अदाणी ने 2009 में गुजरात का जीके जनरल हॉस्पिटल लिया)।

2019 से NITI आयोग की सिफारिशों के आधार पर कई राज्य सरकारें (कर्नाटक सहित) PPP को बढ़ावा दे रही हैं। NITI आयोग का तर्क है कि सीमित संसाधनों के चलते सरकारें मेडिकल शिक्षा की ज़रूरतें पूरी नहीं कर सकतीं। लेकिन वास्तविकता यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें वर्षों से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च कर रही हैं। जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 कहती है कि राज्यों को अपने बजट का कम-से-कम 8% स्वास्थ्य पर खर्च करना चाहिए, कर्नाटक सिर्फ 4.8% ही खर्च कर रहा है। केंद्र सरकार ने 2025-26 में अपने कुल बजट का सिर्फ 2% स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर आवंटित किया है—जो कि बहुत कम है। चिकित्सा शिक्षा का समाधान यही हो सकता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च को बढ़ाया जाए, और ज़िला अस्पतालों से जुड़े नए सरकारी मेडिकल कॉलेज शुरू किए जाएं—न कि इन संस्थानों को व्यापारिक कंपनियों को सौंपा जाए।

PPP योजनाओं से गरीब मरीज़ों को किन गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

  • मरीज़ों को “मुफ्त” और “फी देने वाले” ऐसे दो श्रेणियों में बांटा जाता है। निजी कम्पनियाँ लाभ कमाने को प्राथमिकता देती हैं ,और “मुफ्त” श्रेणी के मरीज़ों के लिए अस्पताल में बिस्तर बहुत कम रहते हैं।
  • “मुफ्त” श्रेणी के मरीज़ों को भी जांचों के लिए भारी शुल्क देना पड़ता है (जैसे एक सामान्य ब्लड टेस्ट के लिए ₹140)।
  • “मुफ्त” बिस्तर न होने का बहाना बनाकर मरीज़ों को वापस कर दिया जाता है।
  • भोजन, रहने, और परिवहन जैसी सहायक सेवाओं के लिए भी पैसे लिए जाते हैं।
  • निजी कम्पनियाँ, फी देने वाले मरीज़ों से मिलने वाली आय का उपयोग “मुफ्त” श्रेणी के मरीज़ों की देखभाल में नहीं करतीं। इसके बजाय वे आयुष्मान भारत–PMJAY जैसी सरकारी बीमा योजनाओं से भुगतान लेती हैं।

इस तरह के PPP करार कॉरपोरेट्स के लिए ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ ऐसा सौदा बन जाते हैं। उन्हें ज़मीन, अस्पताल, और इलाज के लिए भुगतान मिलता है। सरकारें सार्वजनिक धन को इन कंपनियों को सौंपकर आम लोगों के स्वास्थ्य अधिकारों को खोखला कर रही हैं। दुर्भाग्य से, राज्य में सत्ता में आई अलग-अलग पार्टियों ने ऐसी नीतियाँ जारी रखी हैं, जो जनता के हितों को नुकसान पहुँचाती हैं। ये पार्टियाँ, निजीकरण को बढ़ावा देने वाली बाजार-प्रधान सोच से प्रभावित होकर, ऐसे पीपीपी (पब्लिक-प्रायव्हेट पार्टनरशिप) को बढ़ावा देती रही हैं, जबकि इनके असरदार होने का कोई ठोस सबूत नहीं है।

PPP मॉडल के प्रभावी होने का कोई ठोस सबूत नहीं
PPP मॉडल ने गरीबों की पहुंच नहीं बढ़ाई—बल्कि इसे और सीमित किया है। इसके कर्नाटक में बहुत से उदहारण हैं।
– रायचूर में OPEC अस्पताल का Apollo के साथ PPP अनुबंध गंभीर उल्लंघनों के कारण रद्द हुआ।
– उडुपी मातृ एवं शिशु अस्पताल को सरकार ने निजी ऑपरेटर से वापस ले लिया।
– आरोग्य बंधु योजना (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का निजीकरण) बार-बार असफल रही।
– 2019–2023 के बीच कर्नाटक के कैंसर केयर सेंटरों के लिए किया गया PPP (Narayana Health) स्टाफ की कमी, उपकरण विफलता और ग्रामीण बहिष्करण के कारण विफल रहा।


राज्य स्तर पर आंदोलन की शुरुआत

SAAK ने PPP के खतरों को उजागर करते हुए प्रदेशभर के संगठनों से अपील की—जैसे कि वस्त्र उद्योग मज़दूर यूनियन, असंगठित क्षेत्र के मज़दूर, दलित समूह, महिला संगठन, किसान आंदोलन आदि। 17 मई 2025 को एक ऑनलाइन बैठक आयोजित हुई जिसमें इन मुद्दों पर जानकारी दी गई और एक व्यापक मंच/अभियान बना—’कर्नाटक में जिला अस्पतालों के निजीकरण (PPP) के खिलाफ अभियान’। चूंकि 2025-26 के बजट दस्तावेज़ में कोलार जिला अस्पताल को PPP के तहत सौंपे जाने की बात कही गई थी, इसलिए आंदोलन की शुरुआत कोलार से करने का निर्णय लिया गया। तय हुआ कि 6 जून 2025 को वहां रैली आयोजित की जाएगी।


कोलार में प्रदर्शन—जनता ने अधिकारियों को सुनाया साफ संदेश

“हमें मुफ्त सेवाओं का अधिकार है और सार्वजनिक अस्पतालों को इसे सुनिश्चित करना चाहिए। हमें एक सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल चाहिए, हम निजी संस्थानों पर निर्भर नहीं होना चाहते।”

शांतम्मा, महिला अधिकार कार्यकर्ता

6 जून 2025 को ‘जिला अस्पतालों के निजीकरण (PPP) के खिलाफ अभियान’ के बैनर तले कोलार में रैली निकाली गई। इस विरोध में राज्य के लगभग 10 ज़िलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया—किसान, मज़दूर, महिला समूह, मानवाधिकार कार्यकर्ता, दलित संगठन, यौनिक अल्पसंख्यक, छात्र और युवा संगठन। रैली प्रेस क्लब से शुरू होकर जिला अस्पताल (SNR अस्पताल) तक पहुंची। प्रदर्शनकारियों ने ज़िला अस्पतालों के निजीकरण का विरोध करते हुए नारे लगाए। अस्पताल परिसर में एक सार्वजनिक सभा हुई, जहां PPP के खतरों पर लोगों को जानकारी दी गई।

मीटिंग के दौरान कवि और सामुदायिक नेता शशिराज ने कहा—“सार्वजनिक अस्पताल गरीबों की जीवनरेखा हैं और इन्हें बचाना सरकार का कर्तव्य है। इसके बजाय सरकारें इन्हें निजी हाथों में सौंप रही हैं, जो गरीबों के लिए नुकसानदायक होगा।

किसान आंदोलन से जुड़े नारायणस्वामी ने कहा—“सिर्फ पैसे वालों को ही निजी सेवाएं मिल सकती हैं। हमारे जैसे लोगों के लिए सार्वजनिक सुविधाएं ही सस्ती स्वास्थ्य सेवा का एकमात्र ज़रिया हैं।

युवा आयोजक बाबू रेड्डी ने कहा—“सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं गरीबों और हाशिये पर जीन वाले लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इस व्यवस्था को नष्ट कर निजी संस्थाओं को सौंपना, मतलब गरीबों के स्वास्थ्य अधिकारों का गला घोंटना है।

बाद में जिला अस्पताल की डॉक्टर डॉ. शांतम्मा को एक ज्ञापन सौंपा गया, जो जिला सर्जन डॉ. जगदीश की ओर से लिया गया। इसके बाद विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधिमंडलों ने राज्य सरकार को डिप्टी कमिश्नर रवि और जिला स्वास्थ्य अधिकारी श्रीनिवास के माध्यम से याचिकाएं सौंपीं।

डॉ. शांतम्मा ने कहा कि उन्हें अस्पताल के निजीकरण की कोई जानकारी नहीं है, और उन्होंने यह आश्वासन दिया कि वह यह संदेश राज्य प्रशासन तक पहुंचाएंगी। डिप्टी कमिश्नर रवि ने कहा कि वे इस मामले को राज्य सरकार से चर्चा कर मुख्यमंत्री के समक्ष उठाएंगे।

5 जुलाई 2025 को कार्यकर्ताओं ने एक टीवी चैनल (सुवर्णा न्यूज़) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में राज्य स्वास्थ्य मंत्री के साथ चर्चा में भाग लिया और PPP का मुद्दा उठाया। मंत्री ने फिर वही सामान्य उत्तर दिया—“PPP निजीकरण नहीं है, इसके ज़रिए लोगों को बेहतर सुविधाएं और स्टाफ मिलेगा।”

फिर से बना सार्वजनिक – रायचूर में विफल PPP और दोबारा राष्ट्रीयकरण
राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल (RGSH), रायचूर को 2002 में OPEC की सहायता से शुरू किया गया और Apollo Hospitals को PPP मॉडल के तहत सौंपा गया। परंतु समीक्षा में इस मॉडल की गंभीर खामियां सामने आईं। 350 बिस्तरों की क्षमता के बावजूद सिर्फ 154 बिस्तर ही उपलब्ध थे और BPL मरीज़ों के लिए निर्धारित 140 में से केवल 40 बिस्तर ही उपलब्ध थे।
केवल 25% इन-पेशेंट और 15% आउट-पेशेंट ही BPL श्रेणी से थे, जबकि अधिकांश क्षेत्र BPL आबादी वाला था। अनुबंध में जिन विशेष सेवाओं (नेफ्रोलॉजी, गेस्ट्रोएन्टेरोलॉजी) का वादा था, वे उपलब्ध नहीं कराई गईं। अपोलो ने 10 वर्षों में कोई लाभ नहीं दिखाया, और सरकार को इनकी परिचालन हानियों की भरपाई करनी पड़ी।
यह अनुभव दर्शाता है कि PPP मॉडल न तो समानता लाता है और न ही दक्षता, बल्कि यह गरीबों की पहुंच को घटाता है और सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी करता है।
PPP की विफलता से, जन आंदोलन द्वारा अस्पताल की वापसी तक
Apollo के साथ PPP अनुबंध जून 2012 में समाप्त हुआ और सरकार ने इसे नवीनीकृत नहीं किया। अस्पताल बंद कर दिया गया। 285 से अधिक स्टाफ ने “ब्लैक डे” मनाया। 2013-14 में कर्मचारियों और समुदाय के लंबे संघर्ष के बाद अप्रैल 2015 में राज्य के चिकित्सा शिक्षा मंत्री ने इसे पूरी तरह से सार्वजनिक प्रबंधन में पुनः खोला। नई सुविधाएं शुरू की गईं और पुराने कर्मचारियों को सरकारी प्रबंधन के तहत और बढे हुए वेतन के साथ सरकारी सेवा में शामिल किया गया ।
रायचूर का यह उदाहरण दिखाता है कि कैसे सार्वजनिक दबाव और जनसंगठन के द्वारा, विफल निजीकरण से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को फिर से जनता को लौटाया जा सकता है ।

जिला अस्पतालों के निजीकरण के खिलाफ यह अभियान अब आगे बढ़ रहा है।इस प्रक्रिया में पहले के आन्दोलनों और अनुभवों से प्रेरणा और सीख भी ली जा रही है, जिसमें रायचूर में हुए आंदोलन और अस्पताल को निजी प्रबंधन से दोबारा सरकारी नियंत्रण में वापस लेने का अनुभव महत्वपूर्ण है ।

(यह लेख सार्वत्रिक आरोग्य आंदोलन कर्नाटक (SAAK) के कार्यकर्ताओं अपने सामूहिक अनुभव पर आधारित लिखा हुआ है । लेखन और संपादन में प्रसन्ना सालिग्राम का महत्वपूर्ण योगदान है।)

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1 thought on “कर्नाटक में जिला अस्पतालों के निजीकरण के खिलाफ जन आंदोलन”

  1. मुझे पेट मे दर्द था इसीलिये मे kle हॉस्पिटल मे आर्मीत हुआ था उसके बाद उन्होने दो बार डिस्चार्ज दिया और तिसरी बार मे ऑपरेशन किया फिर भी मेरे परेशानी कम नही हुई उन्होने मुझे अपेन्डिस हे ऐसा बोला था और अभी भी मुझे परेशानी सुरू हे इसके खिलाफ मुझे कंप्लेंट करनी है

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